गोपाल कृष्ण अग्रवाल ,
भारत की सांस्कृतिक
संपदा की वास्तविक आर्थिक क्षमता को अभी तक पूरी तरह समझा नहीं गया है। भारत एक
जीवंत संस्कृति है, जो देश की 140 करोड़ जनता के जीवन का हिस्सा है। यह किसी
संग्रहालय में रखी जाने वाली वस्तु नहीं है, बल्कि इसे देश के हर क्षेत्र में
लोगों की दैनिक गतिविधियों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
इस
सांस्कृतिक संपदा का अध्ययन करने और उसका सही दोहन करने के लिए एक व्यवस्थित
कार्ययोजना की ज़रूरत है। सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था को भारत के विकास मॉडल के रूप
में आगे बढ़ाने के लिए समान विचारधारा वाले लोगों और संगठनों को साथ लाना समय की
मांग है।
भारतीय परंपरा
हमारे जीवन में अनुशासन और नैतिक जिम्मेदारी बनाए रखती है। यह एक ऐसे संतुलित समाज
की कल्पना करती है, जहां आध्यात्मिकता और आर्थिक समृद्धि एक साथ मौजूद हों और
मानवता को उज्ज्वल व सामंजस्यपूर्ण भविष्य की ओर ले जाएं।
सांस्कृतिक
अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी ‘ट्रिकल-डाउन थ्योरी’ पर
आधारित नहीं है, जहां अमीरों को मिला लाभ धीरे-धीरे नीचे तक पहुंचे। इसके उलट, यह
एक बॉटम-अप अप्रोच है, जिसमें देश के हर क्षेत्र के लोग बढ़ी हुई आर्थिक
गतिविधियों के प्रत्यक्ष लाभार्थी बनते हैं।
साल 2019 में प्रयागराज कुंभ मेले के सफल आयोजन ने यह स्पष्ट किया कि हमारी सभ्यतागत संपदा में कितनी बड़ी आर्थिक संभावना छिपी हुई है। इस दिशा में और ठोस काम करना होगा।
अगर हम वेनिस या दुनिया के अन्य प्रमुख स्थलों को देखें, तो वहां पहले आर्थिक गतिविधियां फली-फूलीं और फिर कला, संगीत, नृत्य, भोजन और त्योहारों में निवेश बढ़ा। कई देशों में आर्थिक सफलता ने सांस्कृतिक विस्तार का रास्ता खोला।
भारत का अनुभव इससे
अलग है। यहां सांस्कृतिक धरोहर ने आर्थिक विकास को गति दी है। अयोध्या और कुंभ
मेले जैसे उदाहरण बताते हैं कि संस्कृति किस तरह आर्थिक परिवर्तन का माध्यम बन
सकती है। अयोध्या में आज बड़े पैमाने पर आर्थिक बदलाव दिखाई दे रहा है। अगर
संस्कृति और अर्थव्यवस्था भारत में समन्वित तरीके से विकसित हों, तो देश आर्थिक
रूप से मजबूत, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और समग्र रूप से विकसित बन सकता है
किसी भी अवधारणा को
सफल बनाने के लिए उसके चारों ओर एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाना ज़रूरी होता है। भारत
में स्टार्टअप्स के सफल होने का कारण यही है कि सरकार ने कानूनों और कर लाभों में
बदलाव कर उनके लिए एक मजबूत इकोसिस्टम तैयार किया
सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था के लिए भी ऐसा ही पारिस्थितिकी तंत्र चाहिए, जिसमें नागरिकों के साथ-साथ सरकार की भूमिका अहम हो। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भारत यात्रा और पर्यटन के क्षेत्र में 30वें स्थान पर है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत प्राकृतिक संसाधनों में 6वें, सांस्कृतिक संसाधनों में 9वें और मूल्य प्रतिस्पर्धा में 18वें स्थान पर है।
यह साफ दिखाता है
कि भारत की सांस्कृतिक गतिविधियों का मूल्यांकन और मुद्रीकरण अभी ठीक से संरचित
नहीं है।इसी वजह से कई त्योहारों, मंदिरों और सांस्कृतिक पहलों को वह वित्तीय
सहयोग नहीं मिल पाता, जिसके वे हकदार हैं।मोदी सरकार का लक्ष्य इन गतिविधियों के
लिए एक निष्पक्ष और संरचित मूल्यांकन प्रणाली तैयार करना है
एक अन्य रिपोर्ट बताती है कि सांस्कृतिक क्षेत्र में काम करने वाले वैश्विक संगठनों में से केवल 20 प्रतिशत ही खुद को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर मानते हैं। यह आंकड़ा इस बात की ओर इशारा करता है कि सांस्कृतिक गतिविधियों को मजबूत आर्थिक आधार देने की ज़रूरत है।
इन
विचारों को नीतिगत सुझावों में बदलना ज़रूरी है। इसके लिए डेटा-आधारित निर्णय अहम
हैं, क्योंकि ठोस डेटा और शोध के बिना चर्चाएं सिर्फ सैद्धांतिक रह जाती हैं। वास्तविक डेटा एकत्र करना, रुझानों का विश्लेषण करना और सांस्कृतिक आर्थिक विकास
के लिए संरचित मॉडल बनाना ज़रूरी है
हालांकि, कई सरकारी
योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन उनकी जानकारी और पहुंच सीमित है। कलाकारों, सांस्कृतिक
उद्यमियों और संस्थानों को इन योजनाओं से जोड़कर इस अंतर को पाटना होगा। इससे इन
गतिविधियों का वित्तीय पोषण और बेहतर कार्यान्वयन संभव हो पाएगा
हमारे रोडमैप में
सांस्कृतिक अर्थशास्त्र को शासन के पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा बनाना शामिल है। इससे विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक क्षमता को बढ़ावा मिलेगा। सरकार का सार्थक
हस्तक्षेप भारतीय कारीगरों को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुंच दिला सकता
है
भारतीय कारीगरों का
संरक्षण और संवर्धन हमारे सुझावों का अहम पहलू है। यह विकेंद्रीकृत आर्थिक मॉडल
भारत जैसे विविध और विशाल देश के लिए बेहद ज़रूरी है| इससे बड़े पैमाने पर
श्रमिकों के पलायन को रोकने में भी मदद मिलेगी। सांस्कृतिक अर्थतंत्र मंदिरों के
पुनरुद्धार के साथ-साथ लोक नृत्य, संगीत और स्थानीय रंगमंच को भी नई ऊर्जा देगा
आर्थिक विकास के लिए उत्प्रेरकों की ज़रूरत होती है और यह पारिस्थितिकी तंत्र विकसित भारत के लिए ऐसा ही उत्प्रेरक साबित हो सकता है। संस्कृति का सीधा संबंध भले ही यात्रा और पर्यटन से हो, लेकिन इसके ज़रिए आर्थिक विकास के और भी कई रास्ते खुलते हैं। भारत का सांस्कृतिक आर्थिक विकास मॉडल वैश्विक स्तर पर सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विकास की एक महत्वपूर्ण केस स्टडी बन सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी का स्पष्ट विज़न है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत हमारी अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार है।अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ और उज्जैन महाकाल मंदिर कॉरिडोर, कुंभ मेले को नया स्वरूप देना और दुनिया भर में तमिल संस्कृति केंद्र स्थापित करना इसी विज़न की कड़ियां हैं।
जी20 के आयोजन ने
भी दुनिया के सामने भारत की विविध और जीवंत सांस्कृतिक विरासत को प्रभावशाली ढंग
से प्रस्तुत किया
भारतीय संस्कृति
हमारी सॉफ्ट पावर है, जैसा प्रभाव आयुर्वेद और योग के जरिए पहले ही दुनिया में दिख
चुका है। अब यह सुनिश्चित करना होगा कि इन सांस्कृतिक गतिविधियों से होने वाला
आर्थिक लाभ सीधे देश की जनता तक पहुंचे
प्रधानमंत्री का
स्वदेशी का आह्वान दरअसल औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलने का आह्वान है। हज़ार
साल की गुलामी के बाद भारत का सांस्कृतिक पुनर्जागरण हो रहा है। अगर हम अपनी कला
और संस्कृति को जानें, उस पर गर्व करें और स्वदेशी अपनाएं, तो विकसित भारत के
संकल्प को पूरा करने में निर्णायक योगदान दे सकते हैं
(गोपाल कृष्ण अग्रवाल भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। उनका एक्स हैंडल @gopalkagarwal है। ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं।)