Monday, 9 July 2012

सरकार की गलत नीतियों के कारण महंगाई बढ़ रही है |

 सरकार की गलत नीतियों के कारण महंगाई बढ़ रही है

दिन-प्रतिदिन जिस प्रकार महगाई बढ़ रही है. उसके क्या कारण है? महगाई पर कैसे नियंत्रण पाया जा सकता है? देश की बिगड़ रही अर्थव्यवस्था के लिए कौन से कारण जिम्मेदार हैं? क्या सरकार की गलत नीतियो के कारण ऐसा हो रहा है? इसी प्रकार के कुछ प्रश्नों के संदर्भ में जगदम्बा सिंह नै प्रमुख अर्धशास्त्री एवं भारतीय जनता पार्टी इकोनामिक सेल के राष्ट्रीय संयोजक गोपाल कृष्ण अग्रवाल से बातचीत की। पेश है, वार्ता के खास अंश-

इस संदर्भ में श्री गोपाल कृष्ण अग्रवाल का कहना है कि भ्रष्टाचार और ब्लैक मनी के कारण कुछ लोगो के पास पैसा बहुत ज्यादा आ गया है। इससे खरीददारी की क्षमता बढ़ी है। मगर जिस हिसाब से खरीददारी की क्षमता बढ़ी है उसके मुताबिक उत्पादन नहीं बढ़ा है।

कुल मिलाकर स्थिति ऐसी बनी हुई है कि डिमांड एवं सप्लाई में काफी अंतर है। यदि डिमाड अधिक होगी और सप्लाई कम होगी तो महगाई बढ़ेगी ही। ऋण पर ब्याज दर इतनी अधिक हो गई है कि नए उद्योग जरूरत के मुताबिक नहीं लग रहे है।

जब तक नए उद्योग नहीं लगेगे, तब तक उत्पादन बढेगा नहीं। सरकार डिमांड एव सप्लाई में संतुलन बनाने में नाकाम रहीं है। यह काम सरकार को पहले से ही करना चाहिए था। इसके अलावा महगाई के लिए आर्थिक कुप्रबंधन एवं गलत नीतिया भी जिम्मेदार है। महंगाई बढ़ रही है, मगर अनाज सड रहा है। अर्थशास्त्र की यह कौन सी परिभाषा है कि लोग भूखों मरे और अनाज गोदामों में सड़े। होना तो यह चाहिए कि यदि मार्केट में डिमांड अधिक हो तो सप्लाई और बढ़ा देनी चाहिए। कितु यह उलटा हो रहा है। सप्लाई कम होने के बावजूद गेह सहाया जा रहा है। महंगाई बढ़ने के ये कुछ प्रमुख कारण है जिनका निदान कर सरकार महगाई पर अकुश लगा सकती है।

सरकार का कहना है कि अत्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अर्थव्यवस्था की हालत नाजुक है. उसका असर भारत पर भी पड़ना स्वाभाविक है? इस बजह से भी महगाई बढ़ रही है। इस प्रश्न के जबाब में श्री गोपाल कृष्ण अग्रवाल का कहना है कि ऐसी बात नहीं है। अतर्राष्ट्रीय स्तर पर तो डालर मजबूत हो रह है, मगर रुपया क्यों कमजोर हो रहा है? इस हिसाब से तो रुपया भी मजबूत होना चाहिए।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अर्थव्यवस्था यदि कमजोर है, तो महगाई कम होनी चाहिए क्योंकि ऐसी स्थिति में विदेशी बाजार में भारतीय सामानो की सप्लाई कम हो जाती है। जब सामानों की सप्लाई कम होगी तो महगाई घटनी चाहिए या बढ़नी चाहिए। अतर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमते कम हो रही है. यहा क्यो बढ़ रही है। यह सब सरकार के - बहाने बाजी है।

जब वहां पेट्रोलियम पदार्थों की कीमते कम हो रही हैं तो यहां भी - होनी चाहिए। जब वहां डालर मजबूत हो रहा है तो भारत में भी रुपया मजबूत होना चाएि। सरकार चाहे जितनी भी बहाने बाजी कर ले, मगर सारी समस्या मिस मैनेजमेट के कारण उत्पन्न हुई है। भ्रष्टाचार के कारण र मार्केट में इतनी ब्लैक मनी आ गई है कि उसका दुष्प्रभाव हर क्षेत्र में देखने बा को मिल रहा है। रियल स्टेट से लेकर किसी भी क्षेत्र देखिये ब्लैक मनी के करण दाम लगातार बढ़ते जा रहे है. किंतु उसके मुताबिक सप्लई पक्ष कमजोर पड रहा है।

भ्रष्टाचार के कारण ब्लैक मनी तो सबके पास आई नहीं। इसका लाभ तो तो कुछ ही लोगों को मिला है। इस संदर्भ में श्री गोपाल कृष्ण अग्रवाल का ग कहना है कि सिस्टम तो सबके लिए एक ही है ऐसी कोई व्यवस्था तो है नहीं कि नोट छापकर गरीबों में बाट दी जाए. जिससे गरीब लोग भी उनका र मुकाबला कर सके जिनके पास प्रर्याप्त ब्लैक मनी है। चूंकि सिस्टम सभी र के लिए एक है। इसलिए उसका खामियाजा गरीबों को भी भुगतना पड रहा कहै।

आज यदि पूरी अर्थव्यवस्था पर नजर डाली जाये तो अर्थव्यवस्था को आप कहां पाते है? इस प्रश्न के जवाब में श्री गोपाल कृष्ण अग्रवाल न का कहना है कि अभी हाल में कुछ प्रमुख उद्योगपतियों ने कुछ बातें कहो है उसी से भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है। उद्योगपति अजीम प्रेम जी ने कहा है कि भारत बिना किसी लीडर के चल रहा है। नारायण मूर्ति ने भी अर्थव्यवस्था के के संदर्भ में निगेटिव बात कहीं है। कल मिलाकर कहने का आशय यही है कि देश के तमाम - उद्योगपतियो ने अर्थव्यवस्था की भयावह स्थिति को लेकर चिंता जाहिर - की है। प्रधानमंत्री ने स्वयं कहा है कि हमारी अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुजर रही है। आखिर प्रधानमंत्री जी किस बता रहे है?

सरकार उन्हें चलानी है. सब कुछ उन्हें हो करना है तो वे किसको बता रहे है। दरअसल देश की अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए मजबूत एवं दृढ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है. किंतु वह राजनीतिक इच्छाशक्ति इस सरकार में नहीं है। हमारी अर्थव्यवस्था वास्तव में उतनी खराब नहीं है जितनी राजेतिक नेतृत्व को अक्षमता के कारण कृतिम रूप से खराब हुई है।

गोपाल कृष्ण अग्रवाल,
राष्ट्रीय प्रवक्ता, भाजपा। 

Friday, 6 July 2012

क्यों बेसार है भ्रष्टाचार विरोधी कानून

 क्यों बेसार है भ्रष्टाचार विरोधी कानून

हमारे यहां भ्रष्टाचार का कोई भी मामला उजागर होने के बाद लंबी कानूनी लड़ाई में फंस जाता है, जिसे पूरा होने में बरसों लग जाते हैं। सबूतों के अभाव में प्रायः आरोपी बच जाता है और लूट के धन के साथ आनंद से जीवन बिताता है। हमारी भ्रष्टाचार निरोधक व्यवस्था नख-दंतविहीन है।

देश में हुए विभिन्न घोटालोके खुलासे और उन पर तत्परता से कार्रवाई करने में सरकार की विफलता ने हमारी अर्थव्यवस्था को नाजुक स्थिति को सामने ला दिया है। भ्रष्टाचार हमारे राष्ट्रीय ताने-बाने को जड़ों से कुतर रहा है। वे दिन गुजरे ज्यादा समय नहीं हुआ है जब हमारे देशवासी विश्वास से लबरेज थे और पूरी दुनिया के साथ हम उभरते भारत की बात कर रहे थे। सबकुछ ठीक था और हम गुंजायमान लोकतंत्र, युवा ताकत सेवा क्षेत्र में तेजी, ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के विकास, विशाल घरेलू बाजार और हम दुनिया भर में कुछ करके दिखा सकते हैं की बात करते थे। हममें विश्व से मुकाबला करने का जोश था।  

हम 2020 तक विश्व की आर्थिक शक्ति बनने वाले थे। फिर क्या ऐसा हो गया कि हमारी धारणा कमजोर हो गई। व्यावसायियों का विश्वास डगमगा गया। दुनिया भारत में भ्रष्टाचार के उच्च स्तर को लेकर दुख प्रकट कर रही है। भ्रष्टाचार विश्वभर में मौजूद है, लेकिन विश्व में कहीं भी एक बार भ्रष्ट व्यक्ति पकड़ा जाता है तो उसे बुरी तरह दंडित किया जाता है, उसकी संपत्ति जब्त कर ली जाती है। लेकिन भारत में वह इस्तीफा मात्र देता है और मामला लबी कानूनी लड़ाई में फंस जाता है जिसे पूरा होने में बरसों लग जाते हैं और अंतत सबूत की कमी से वह दोषी साबित नहीं हो पाता है और इस तरह वह लूट के धन के साथ आनंद से जीवन बिताता है। हमारी भ्रष्टाचार रोधी व्यवस्था दंतविहीन है।

केंद्रीय स्तर पर देश में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए केंद्रीय सतर्कता आयोग, सतर्कता विभाग और केंद्रीय जांच ब्यूरो हैं। सीबीआई एक पुलिस स्टेशन की तरह कार्य करती है। वह जांच कर सकती है। एफआईआर दर्ज कर सकती है। वह केंद्र सरकार के किसी भी विभाग से संबंधित केस की जांच कर सकती है या उन केसों की जो कोर्ट या राज्य सरकार द्वारा निर्देशित होते हैं। चूंकि सीबीआई केंद्र सरकार के सीधे नियंत्रण में होती है। इसलिए इसकी विश्वसनीयता प्रभावित हुई है।

राज्यों में तो स्थिति और भी खराब है। राज्यों के सभी सतर्कता विभाग या एजेंसी और भ्रष्टाचार निरोधी एजेंसियां सीधे तौर पर राज्य सरकार के अधीन हैं, इसलिए वे अपने राजनीतिक आकाओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की निष्पक्ष जांच में प्रभावहीन रहते हैं। कुछ राज्यों में लोकायुक्त जैसी संस्था भी है। परंतु ये लोकायुक्त अपने आप कोई भी जांच नहीं शुरू कर सकते। एक निश्चित स्तर के ऊपर के अधिकारियों के खिलाफ जांच के लिए इन्हें राज्य सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है।

आज समाज में भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक गुस्सा है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रवाह के क्षेत्र में भी स्थिति बुरी है। द हिंदू में जीएफआई की रिपोर्ट के मुताबिक, हर 24 घंटे औसतन करीब 240 करोड़ रुपए अवैध धन भारत से बाहर जा रहा है। हमारे पास कोई उचित कानून या ऐसी अंतरराष्ट्रीय संधि नहीं है जिससे विदेशों में जमा अवैध धन वापस लाया जा सके या विदेशों में धन जमा करने पर अंकुश लगाया जा सके। सरकार में न केवल इच्छाशक्ति की कमी है बल्कि वह छलावा कर रही है और दोषी लोगों को बचा रही है। । यह मात्र कर चोरी का मुद्दा नहीं है जैसा कि सरकार पेश करने की कोशिश कर रही है बल्कि एक आपराधिक करतूत है। सरकार को सही मंशा होती और वह इस पैसे को वापस लाना एवं इसे बढ़ावा देने से रोकना चाहती तो ने वह इस दिशा में कदम उठा सकती थी। अमेरिका और कई अन्य देशों ने सिद्ध कर दिया । है कि घूसखोरी की समस्या से सफलतापूर्वक । निपटा जा सकता है। अमेरिकी अदालतों ने ऐसे कानूनों का इस्तेमाल किया है और बड़ी कंपनियों को घूसखोरी का दोषी पाया है।

जबरदस्त जन आक्रोश के चलते ब्रिटेन को भी 2010 में एक कानून बनाना पड़ा जिसे दुनिया में सबसे सख्त रिश्वत-रोधी कानून कहा जाता है।

 विदेशी बैंकों व देशों में जमा भारतीय धन को वापस लाना एक थकाउ प्रक्रिया है जिसके लिए एक मजबूत राजनीतिक इच्छा, अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करने के कड़े प्रयासों की जरूरत है। इसके अलावा, मुद्दा केवल विदेशी बैंकों में पहले से जमा भारतीय धन को वापस लाने का नहीं है बल्कि भारत से आगे यह धन और न निकले, इसकी व्यवस्था करने का है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय परस्पर कानूनी सहयोग सबसे अहम है, भारत को भ्रष्टाचार पर यूएन संधि, अंतरराष्ट्रीय कारोबारी लेन-देन में विदेशी सरकारी अधिकारियों की घूसखोरी से लड़ने पर ओईसीडी संधि जैसी विभिन्न संधियों में सुधार कर भ्रष्टाचार के खिलाफ वैश्विक आंदोलन में शामिल होना पड़ेगा। दूसरा, हमें इन संधियों की जरूरतों के मुताबिक, अपने संबंधित कानूनों में संशोधन करना पड़ेगा।

 भारत को निजी क्षेत्र में घूसखोरी पर अब भी कानून बनाना बाकी है जिसमें कारोबार या पेशे को आगे बढ़ाने के लिए जानबूझकर घूस देने या लेने को एक आपराधिक गतिविधि मानो जाए। ऐसा देखा गया है कि भारत में कारोबारी इकाइयों ने कर चुराने के लिए कर-चोरी की पनाहगाह बने देशों का इस्तेमाल किया है। अमेरिका ने अपने नागरिकों द्वारा इस तरह के दुरुपयोग से सख्ती से निपटने के लिए हाल ही में एक कानून पारित किया है। एनजीओ एवं निजी क्षेत्र में घूसखोरी रोधक

 कानून भ्रष्टाचार एवं कालेधन के कई आयाम हैं, जिसमें महत्वपूर्ण पहलू है इसका सृजन। भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की समिति ने भी हमारी भ्रष्टाचार रोधी प्रणाली में कई खामियां पाई हैं। निजी क्षेत्र और एनजीओ में घूसखोरी रोकने के लिए हमारे पास कोई कानून नहीं है। ठेके और लाइसेंस आदि के मूल्यांकन के संबंध में तीसरे पक्ष के जरिए तुष्टिकरण और घूसखोरी, सरकारी नीतियों पर चर्चा के जरिए लामबंदी एवं निजी क्षेत्र द्वारा घूसखोरी पर अंकुश लगाने के संबंध में हमारे प्रावधानों में भी खामियां हैं। हमारे कानूनी

 फ्लोटिंग वारंट अवधारणा कर-चोरी की पनाहगाह बने देशों में जमा धन के अपराधीकरण के संबंध में भी प्रावधानों की कमी है। कर चोरी टैक्स हैवेन देशों में अपराध नहीं है। इसलिए इस मोचें पर सूचना के आदान-प्रदान के लिए हमारे पास अधिकारों की कमी है। जब दोषी की पहचान नहीं हो पाती तो हम अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ एक फ्लोटिंग वारंट जारी कर सकते हैं और इस वारंट के आधार पर विदेशों में खाता रखने वाले उस व्यक्ति को जिसे हम नहीं जानते हैं. अपराधी घोषित किया जा सकता है और उसके बारे में जानकारी मांगी जा सकती है। इस तरह से यह वारंट बाद में व्यक्ति की पहचान स्थापित होने पर उसके नाम लागू हो जाता है।

भ्रष्टाचार के कई एवं कालेधन आयाम हैं। निजी क्षेत्र और एनजीओ में घूसखोरी रोकने के लिए हमारे पास कोई कानून नहीं है।

भाजपा प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल